Physical Address
sidcul BHEL, Inderlok Colony, near Pentagon Mall Road, Shivalik Nagar, Haridwar, Uttarakhand 249403


कुछ लोग रिश्ते निभाते नहीं,
इस्तेमाल करते हैं— और जब इस्तेमाल पूरा हो जाए,
तो निकलते वक्त दोष भी छोड़ जाते हैं। 💭
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!
ये बात मैंने किसी किताब में नहीं पढ़ी,
मैंने खुद को इसमें जीते हुए देखा है।
शुरुआत बहुत साधारण थी।
ना कोई बड़ा वादा 🤝
ना कोई भारी उम्मीद 🌱
बस बातचीत, अपनापन और भरोसा।
लेकिन फिर मैंने वो किया
जो दिल से जुड़े लोग करते हैं—
मैंने अहमियत देना शुरू कर दिया।
पहले वक्त दिया ⏳
फिर ध्यान 👀
फिर प्राथमिकता ⭐
और एक दिन
मैंने खुद को
उस लिस्ट से हटा दिया
जिसमें मेरी ज़रूरतें लिखी होती हैं। 😶
मुझे हमेशा यही लगा कि
अगर किसी को अहमियत दे रहे हो
तो इस तरह दो
कि कल को वो चला भी जाए
तो खुद से ये न कहना पड़े—
“काश मैंने और कोशिश की होती।”
इसलिए मैंने कोई कसर नहीं छोड़ी।
मैं झुका,
ताकि वो ऊँचा महसूस करे।
मैं चुप रहा,
ताकि उसे सुकून मिले।
मैं छोटा बना,
ताकि वो बड़ा दिखे।
धीरे-धीरे
मेरी बातें इंतज़ार करने लगीं ⌛
मेरी तकलीफ़ “overthinking” कहलाने लगी 🤯
और मेरी मौजूदगी
उसके लिए guaranteed हो गई।
यहीं से रिश्ता बदलने लगा।
क्योंकि जो चीज़ guaranteed हो जाए,
उसकी क़ीमत
अक्सर zero समझ ली जाती है। ⚠️
मैंने फिर भी खुद को समझाया—
शायद ये भी एक phase है।
शायद मैं ही ज़्यादा सोच रहा हूँ।
तो मैंने अहमियत
और बढ़ा दी।
इतनी कि
वो उसकी औक़ात से बाहर चली गई।
मैं हर बार available रहा 📱
हर बार समझाने वाला मैं ही बना 🧠
हर बार adjust करने वाला
मैं ही निकला।
और वो?
वो धीरे-धीरे ऊबने लगा।
उसे मेरी caring
घुटन लगने लगी 😮💨
मेरी presence
control लगने लगी 🔒
मैं कुछ बदला नहीं था—
बस लगातार वही था।
फिर एक दिन,
बिना किसी बड़ी लड़ाई के,
बिना किसी साफ़ वजह के—
वो दूर हो गया। 🚶♂️
धीरे।
शांत।
बिल्कुल ऐसे
जैसे कभी कोई रिश्ता था ही नहीं।
और जाते-जाते
उसने मुझे दोषी ठहरा दिया।
कहा गया कि मैं “ज़्यादा” था।
ज़्यादा caring 💗
ज़्यादा involved 🤝
ज़्यादा available ⏰
मैंने जवाब नहीं दिया।
क्योंकि तब तक
मुझे एक बहुत गहरी सच्चाई समझ आ चुकी थी—
और वो दोष
अक्सर उसी को मिलता है
जो आख़िर तक खड़ा रहता है। 🧍♂️
उस दिन
मैंने खुद को आईने में देखा। 🪞
ना टूटा हुआ।
ना हारा हुआ।
बल्कि ऐसा इंसान
जिसने अपनी तरफ़ से
कुछ भी अधूरा नहीं छोड़ा था।
मुझे अफ़सोस नहीं था।
न झुकने का 🙇
न रुकने का ⏸️
न ज़्यादा देने का 💯
क्योंकि मैंने अहमियत
इस हद तक दी थी
कि अब खुद से
कोई सवाल नहीं बचा था।
मैंने सीखा कि
अहमियत देना ग़लत नहीं होता।
ग़लत तब होता है
जब सामने वाला
उसे संभालने के क़ाबिल न हो। ⚖️
कुछ लोग बराबरी चाहते हैं 🤝
कुछ लोग नियंत्रण 🔗
और कुछ लोग…
बस आज़ादी 🕊️
और आज़ादी पाने के लिए
उन्हें किसी न किसी को
दोषी बनाना ही पड़ता है।
मैंने उन्हें वो मौका दे दिया।
आज जब पीछे देखता हूँ,
तो मन भारी नहीं,
शांत है। 🌊
क्योंकि मैंने किसी को
कम नहीं दिया—
मैंने हद से ज़्यादा दिया।
इतना ज़्यादा
कि उसे बोझ लगने लगा।
इतना ज़्यादा
कि वो खुद निकल गया।
और जाते-जाते
मुझे दोषी ठहरा गया।
लेकिन फर्क साफ़ है—
वो चला गया
दोष लेकर।
और मैं रह गया
सुकून लेकर। ✨
अगर आपको ऐसी सोच पसंद है, तो हमारी दूसरी कहानियाँ भी पढ़ें।
हमारे टेक्निकल वेब को विजिट करें
