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हक़ नहीं था, फिर भी सब कुछ था Part-1

हक़ नहीं था Part-1 | जब सब कुछ शुरू हुआ

कुछ कहानियाँ शोर से नहीं,
ख़ामोशी से शुरू होती हैं।

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मेरी कहानी भी कुछ ऐसी ही थी।

वो कोई खास दिन नहीं था,
न कोई खास जगह।
बस एक आम-सी मुलाक़ात थी,
जिसे मैंने भी शुरुआत में
ज़्यादा अहमियत नहीं दी।

वो हँसी थी,
मैं सुन रहा था।
वो बोल रही थी,
मैं समझ रहा था।
और शायद यहीं से
मैं उसकी बातों में
खुद को ढूँढने लगा था।

धीरे-धीरे बातें बढ़ने लगीं।
पहले ज़रूरत से,
फिर आदत से,
और फिर…
बिना वजह।

उसका एक “कैसी हो?”
मेरे पूरे दिन को बेहतर बना देता था।
और अगर किसी दिन
उसका मैसेज नहीं आता,
तो दिन वैसे ही अधूरा लगता।

मुझे याद है,
एक बार उसने हँसते हुए कहा था —
“तुम बड़े अच्छे हो।”

मैं मुस्कुरा दिया था,
लेकिन अंदर कहीं
कुछ अजीब-सा चुभ गया था।

क्योंकि मैं अच्छा नहीं बनना चाहता था,
मैं बस
उसका होना चाहता था।

वो अपनी बातें मुझसे शेयर करती थी।
दिन कैसा गया,
किससे बात हुई,
किस बात पर गुस्सा आया।

और मैं…
मैं सब सुनता था।
ध्यान से,
पूरी ईमानदारी से।

कभी-कभी मुझे लगता था
कि शायद वो भी कुछ महसूस करती है।
पर अगले ही पल
वो मुझे मैं चली जाऊँगी कहकर
सब साफ़ कर देती थी।

हक़ नहीं था – मैं चली जाऊँगी………..

ये शब्द मुझे
अंदर ही अंदर कचोटता था,
पर मेरे पास शब्द नहीं
होते थे, गुस्सा कर देता था।

मैं उसकी पसंद जानता था,
उसकी नापसंद समझता था।
उसे कौन-सा गाना पसंद है,
किस बात पर वो चुप हो जाती है,
किस बात पर उसकी आँखें चमक उठती हैं।

पर उसे मेरे बारे में
इतना जानने की ज़रूरत ही नहीं थी।

मैं उसके लिए हमेशा available था।
वो चाहे आधी रात को लिखे,
या सुबह जल्दी कॉल करे।

और वो… वो जब चाहे
मेरी ज़िंदगी में आती-जाती रही।

मैंने कभी शिकायत नहीं की।
क्योंकि शिकायत करने के लिए
रिश्ता होना ज़रूरी होता है।

और हमारा रिश्ता…
बस उसकी सहूलियत तक था।

फिर भी, मैं खुश था।

कम से कम
उसकी ज़िंदगी में
मेरी कोई जगह तो थी।

कभी-कभी
वो किसी और की बात करती थी।
हल्के-से मज़ाक में,
या ऐसे ही।

मैं सुनता था,
और मुस्कुराता था।

रात को जब सब सो जाते थे,
तब मेरी सोच जागती थी।
उसकी बातें,
उसकी हँसी,
उसकी आवाज़।

मैं खुद से पूछता था —
“क्या वो कभी मुझे ऐसे देखेगी
जैसे मैं उसे देखता हूँ?”

और जवाब हमेशा
ख़ामोशी में ही मिलता था।

शायद
मैं ज़्यादा सोच रहा था।
या शायद
मैं ही ज़्यादा महसूस कर रहा था।

क्योंकि
उसके लिए
मैं बस कोई था।

और मेरे लिए…
वो सब कुछ।

मुझे नहीं पता था
कि ये शुरुआत है
या चेतावनी।

मुझे बस इतना पता था
कि मैं
धीरे-धीरे
उसका होता जा रहा था।

और उसे…
इसकी भनक तक नहीं थी।


क्योंकि कुछ कहानियाँ,
शुरू होते ही
ख़तरे का एहसास देने लगती हैं…

हक़ नहीं था – आदत से मोहब्बत तक

कहते हैं न,
आदत और मोहब्बत में
फ़र्क करना सबसे मुश्किल होता है।

मुझे भी शुरुआत में नहीं पता चला
कि जो मैं महसूस कर रहा हूँ
वो सिर्फ़ आदत नहीं थी।

अब मेरी रोज़मर्रा की ज़िंदगी
का वो हिस्सा बन चुकी थी।
सुबह उठते ही
फोन देखने की वजह वही होती थी,
और रात को सोने से पहले
आख़िरी ख़याल भी वही।

अगर उसका मैसेज आ जाता,
तो मैं किसी भी काम में लगा होऊँ,
सब छोड़ देता था।
और अगर देर हो जाती,
तो बिना वजह
दिल बेचैन हो जाता था।

Dependent होना सही नहीं है

मुझे खुद पर हँसी आती थी,
कि मैं इतना dependent
कब से हो गया।

वो मुझसे अपनी परेशानियाँ शेयर करती थी।
कभीघर की बातें, कभी दोस्तों की,
कभी अपनी उलझनें।

हालांकि मैं ध्यान से सुनता था।
सलाह देता था,
या सिर्फ़ सुनता रहता था।

क्योंकि कभी-कभी
किसी को समाधान नहीं,
बस कोई चाहिए होता है
जो उसे समझे।

और मैं उसके लिए
वो “कोई” बन गया था।

पर सच ये था कि वो मेरे लिए
बहुत कुछ बन चुकी थी।

एक दिन उसने कहा —
“तुम ना, मुझे बहुत समझते हो।”

उस दिन
मैंने बहुत कुछ नहीं कहा।
बस मुस्कुरा दिया।

लेकिन अंदर
कहीं कुछ और ही चल रहा था।

क्योंकि
समझना और चाहना
दो अलग चीज़ें होती हैं।

और मैं उसे सिर्फ़ समझ नहीं रहा था,
मैं उसे चाहने लगा था।

मुझे उसकी छोटी-छोटी बातें
बहुत बड़ी लगने लगी थीं।
वो किस बात पर हँसती है,
किस बात पर चुप हो जाती है,
कब वो खुद से लड़ रही होती है।

मैं सब पहचानने लगा था।

और सबसे अजीब बात ये थी
कि उसने कभी मुझसे
ये सब जानने को कहा ही नहीं था।

मैं खुद ही उसकी दुनिया में
गहराई तक उतर गया था।

कभी-कभी वो गायब हो जाती थी।
कोई मैसेज नहीं, कोई कॉल नहीं।

मैं परेशान नहीं होता था,
लेकिन खाली ज़रूर हो जाता था।

और जब वो वापस आती,
तो ऐसे बात करती
जैसे कुछ हुआ ही न हो।

मैं भी कुछ नहीं कहता था।

क्योंकि सवाल पूछने से
जवाब बदल सकते हैं।

और मैं उसके जवाबों से डरता था।

एक दिन उसने हँसते-हँसते कहा —
“यार, अगर मेरी लाइफ़ में कोई हो ना,
तो वो तुम्हारे जैसा होना चाहिए।”

वो लाइन मेरे दिल में अटक गई।

हक़ नहीं था – मज़ाक

मैंने मज़ाक में पूछा —
“कुछ दिन बाद कहोगे कि
मेरे जैसा नहीं होना चाहिए?”

उसने बात टाल दी।

उस पल मुझे पहली बार समझ आया
जिस दिन जाएगी,पलट के भी नहीं देखेगी
क्योंकि फिलहाल ही जवाब नहीं है।

मैंने उस दिन खुद से झूठ बोला।
खुद को समझाया कि मैं खुश हूँ।

पर सच ये था कि मैं धीरे-धीरे
खुद को खो रहा था।

उसकी खुशी में खुश रहना
अच्छी बात है, लेकिन
अपनी खुशी भूल जाना
ख़तरनाक होता है।

समझ

मगर तब
मुझे ये समझ कहाँ थी।

मैं बस इतना जानता था
कि अगर वो साथ है,
तो सब ठीक है।

और अगर वो नहीं है,
तो भी मैं इंतज़ार कर लूँगा।

क्योंकि जिसे खोने का हक़ नहीं होता,
वो ही सबसे ज़्यादा इंतज़ार करता है।

मुझे नहीं पता था कि ये इंतज़ार
किस मोड़ पर ले जाएगा।

नहीं जानता था कि आगे दूरी लिखी है।

मुझे बस इतना पता था कि मैं
मैं उसका हो चुका था।

और उसे… अब भी
इसका अंदाज़ा नहीं था।

(जारी रहेगा — हक़ नहीं था Part-2)

क्योंकि हर आदत,
हमेशा साथ नहीं चलती…

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ANKUR GOSWAMI
ANKUR GOSWAMI
Articles: 17

2 Comments

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