हक़-नहीं-था-फिर-भी-सब-कुछ-था

हक़ नहीं था, फिर भी सब कुछ था Part-2

Part-2 | आदत से मोहब्बत तक

कहते हैं न,
आदत और मोहब्बत में
फ़र्क करना सबसे मुश्किल होता है।

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मुझे भी शुरुआत में नहीं पता चला
कि जो मैं महसूस कर रहा हूँ
वो सिर्फ़ आदत नहीं थी।

अब मेरी रोज़मर्रा की ज़िंदगी
का वो हिस्सा बन चुकी थी।
सुबह उठते ही
फोन देखने की वजह वही होती थी,
और रात को सोने से पहले
आख़िरी ख़याल भी वही।

अगर उसका मैसेज आ जाता,
तो मैं किसी भी काम में लगा होऊँ,
सब छोड़ देता था।
और अगर देर हो जाती,
तो बिना वजह
दिल बेचैन हो जाता था।

Dependent होना सही नहीं है

मुझे खुद पर हँसी आती थी,
कि मैं इतना dependent
कब से हो गया।

वो मुझसे अपनी परेशानियाँ शेयर करती थी।
कभीघर की बातें, कभी दोस्तों की,
कभी अपनी उलझनें।

हालांकि मैं ध्यान से सुनता था।
सलाह देता था,
या सिर्फ़ सुनता रहता था।

क्योंकि कभी-कभी
किसी को समाधान नहीं,
बस कोई चाहिए होता है
जो उसे समझे।

और मैं उसके लिए
वो “कोई” बन गया था।

पर सच ये था कि वो मेरे लिए
बहुत कुछ बन चुकी थी।

एक दिन उसने कहा —
“तुम ना, मुझे बहुत समझते हो।”

उस दिन
मैंने बहुत कुछ नहीं कहा।
बस मुस्कुरा दिया।

लेकिन अंदर
कहीं कुछ और ही चल रहा था।

क्योंकि
समझना और चाहना
दो अलग चीज़ें होती हैं।

और मैं उसे सिर्फ़ समझ नहीं रहा था,
मैं उसे चाहने लगा था।

मुझे उसकी छोटी-छोटी बातें
बहुत बड़ी लगने लगी थीं।
वो किस बात पर हँसती है,
किस बात पर चुप हो जाती है,
कब वो खुद से लड़ रही होती है।

मैं सब पहचानने लगा था।

और सबसे अजीब बात ये थी
कि उसने कभी मुझसे
ये सब जानने को कहा ही नहीं था।

मैं खुद ही उसकी दुनिया में
गहराई तक उतर गया था।

कभी-कभी वो गायब हो जाती थी।
कोई मैसेज नहीं, कोई कॉल नहीं।

मैं परेशान नहीं होता था,
लेकिन खाली ज़रूर हो जाता था।

और जब वो वापस आती,
तो ऐसे बात करती
जैसे कुछ हुआ ही न हो।

मैं भी कुछ नहीं कहता था।

क्योंकि सवाल पूछने से
जवाब बदल सकते हैं।

और मैं उसके जवाबों से डरता था।

एक दिन उसने हँसते-हँसते कहा —
“यार, अगर मेरी लाइफ़ में कोई हो ना,
तो वो तुम्हारे जैसा होना चाहिए।”

वो लाइन मेरे दिल में अटक गई।

मज़ाक

मैंने मज़ाक में पूछा —
“कुछ दिन बाद कहोगे कि
मेरे जैसा नहीं होना चाहिए?”

उसने बात टाल दी।

उस पल मुझे पहली बार समझ आया
जिस दिन जाएगी,पलट के भी नहीं देखेगी
क्योंकि फिलहाल ही जवाब नहीं है।

मैंने उस दिन खुद से झूठ बोला।
खुद को समझाया कि मैं खुश हूँ।

पर सच ये था कि मैं धीरे-धीरे
खुद को खो रहा था।

उसकी खुशी में खुश रहना
अच्छी बात है, लेकिन
अपनी खुशी भूल जाना
ख़तरनाक होता है।

समझ

मगर तब
मुझे ये समझ कहाँ थी।

मैं बस इतना जानता था
कि अगर वो साथ है,
तो सब ठीक है।

और अगर वो नहीं है,
तो भी मैं इंतज़ार कर लूँगा।

क्योंकि जिसे खोने का हक़ नहीं होता,
वो ही सबसे ज़्यादा इंतज़ार करता है।

मुझे नहीं पता था कि ये इंतज़ार
किस मोड़ पर ले जाएगा।

नहीं जानता था कि आगे दूरी लिखी है।

मुझे बस इतना पता था कि मैं
मैं उसका हो चुका था।

और उसे… अब भी
इसका अंदाज़ा नहीं था।


(जारी रहेगा — Part-3)

क्योंकि हर आदत,
हमेशा साथ नहीं चलती…

ANKUR GOSWAMI
ANKUR GOSWAMI
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